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“राष्ट्रपति-राज्यपाल की शक्तियां मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गवर्नर और राष्ट्रपति पर बिल मंजूरी की समयसीमा तय नहीं की जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गवर्नर बिल रोककर नहीं बैठ सकते—या मंजूरी दें, या वापस विधानसभा भेजें, या राष्ट्रपति को भेजें।”

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति-राज्यपाल की शक्तियां से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पारित बिलों को मंजूरी देने के लिए कोई न्यायिक समयसीमा तय नहीं की जा सकती, क्योंकि यह उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन होगा।

SC ने क्या कहा?

पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह न्यायपालिका का क्षेत्र नहीं कि वह राष्ट्रपति या राज्यपाल के कार्यों पर कोई समयसीमा निर्धारित करे लेकिन साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि—राज्यपाल के पास बिलों को अनिश्चितकाल तक रोकने की पूर्ण शक्ति नहीं है।

राज्यपाल को तीन विकल्प हैं:

  1. बिल को मंजूरी दें
  2. विचार हेतु विधानसभा को वापस भेजें
  3. राष्ट्रपति के पास भेजें

SC ने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का दायित्व है कि वे विधायी प्रक्रिया में बाधा बनने के बजाय उसे तर्कसंगत रूप से आगे बढ़ाएं।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

बीते वर्षों में कई राज्यों में राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच टकराव बढ़ा है। कई आरोप लगे कि राज्यपाल जानबूझकर बिल लंबित रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने पहली बार इन शक्तियों की स्पष्ट व्याख्या की है।

संविधान का संतुलन

SC ने कहा कि संविधान ने राष्ट्रपति व राज्यपाल को विशिष्ट अधिकार दिए हैं, लेकिन इनका उपयोग “संवैधानिक नैतिकता” और “लोकतांत्रिक परंपराओं” के अनुरूप होना चाहिए।

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विशेष संवाददाता – मनोज शुक्ल

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