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भारत ने सिंधु जल संधि से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के आदेश को अवैध बताते हुए मानने से इनकार कर दिया है। भारत ने कहा कि आतंकवाद के चलते संधि अस्थायी रूप से निलंबित है।

हाइलाइट्स:

  • भारत ने सिंधु जल संधि से जुड़े अंतरराष्ट्रीय आदेश को ठुकराया
  • कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को बताया अवैध और असंवैधानिक
  • बैगलीहर और किशनगंगा परियोजनाओं के रिकॉर्ड मांगे गए थे
  • आतंकवाद के चलते भारत पहले ही संधि अस्थायी रूप से निलंबित कर चुका है
  • मामला अब जल बंटवारे से आगे बढ़कर सुरक्षा और भरोसे का बन गया है

नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को लेकर टकराव एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेज हो गया है। पाकिस्तान जहां इस मुद्दे को अलग-अलग अदालतों और मंचों पर घसीट रहा है, वहीं भारत ने साफ कर दिया है कि वह अवैध तरीके से गठित किसी भी अंतरराष्ट्रीय अदालत के आदेश को मानने वाला नहीं है।

भारत ने सिंधु जल संधि से जुड़े कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (Court of Arbitration) के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें भारत से बैगलीहर और किशनगंगा हाइड्रोपावर परियोजनाओं के ऑपरेशन रिकॉर्ड और लॉगबुक सौंपने को कहा गया था। अदालत ने इसके लिए 9 फरवरी 2026 तक की समय-सीमा तय की थी।

“यह प्रक्रिया ही अवैध है” – भारत

सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत का स्पष्ट रुख है कि यह तथाकथित अदालत अवैध रूप से गठित की गई है और उसका कोई संवैधानिक या कानूनी अधिकार नहीं है।
भारत ने दो टूक कहा है कि वह इस प्रक्रिया में न तो भाग लेगा और न ही किसी तरह का दस्तावेज सौंपेगा।

भारत का यह भी कहना है कि चूंकि सिंधु जल संधि स्वयं अस्थायी रूप से लंबित (suspended) है, इसलिए उसके तहत कोई बाध्यकारी दायित्व भारत पर लागू नहीं होता।

आतंकवाद बना निर्णायक कारण

गौरतलब है कि भारत ने 23 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का हवाला देते हुए सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से निलंबित करने की घोषणा की थी।
भारत का तर्क है कि जब एक पक्ष लगातार सीमापार आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा हो, तो भरोसे पर आधारित कोई भी अंतरराष्ट्रीय संधि अपने मूल उद्देश्य खो देती है।

पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय गुहार

पाकिस्तान इस पूरे मुद्दे को लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा रहा है और भारत पर संधि के पालन का दबाव बना रहा है।
हालांकि भारत का कहना है कि शांति, भरोसा और सुरक्षा के बिना किसी भी समझौते को एकतरफा ढंग से लागू नहीं किया जा सकता।

रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यह विवाद अब केवल जल-साझाकरण का तकनीकी मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत-पाक रिश्तों, सीमा सुरक्षा आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय कानून की वैधता से जुड़ चुका है।

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