Communication of young heart Swami Vivekananda Ji 163rd birth anniversary 12 January 2026
  • January 12, 2026
  • kamalkumar
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ज्ञानी त्रिवेदी : युवा हृदय की प्रेरणा,मानवतावाद के मेरूदंड,भारत के आध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक गौरवशाली अतीत को विश्व पटल पर परिभाषित करने वाले युगपुरुष,दरिद्र नारायण की सेवा ही सर्वोपरी के महान भाव को परिलक्षित कर भारत राष्ट्र एवं मातृभूमि की सेवा सर्वप्रथम का सन्देश देकर युवा वर्ग को मार्गदर्शन प्रदान किया..मेरा सादर प्रणाम !

सन् 1863ई.की 12 जनवरी पौष संक्रान्ति के दिन प्रातः 6 बजकर 33 मिनट पर हुआ था,अपने माता पिता की छठवीं सन्तान थे।
स्वामी विवेकानंद जी के पिता का नाम श्री विश्वनाथ दत्त और माता भुवनेश्वरी देवी था!
प्रथम नामकरण वीरेश्वर के रूप में पडा,जो बाद में नरेंद्रनाथ में परिवर्तित हुआ।
नरेंद्रनाथ 1871ई.में मेट्रोपोलिटन स्कूल से प्रथम श्रेणी में एन्ट्रेन्स परीक्षा उत्तीर्ण होकर कलकत्ता प्रेसीडेंसी कालेज में दाखिल हुए थे!
जनरल असेम्बली(स्कॉटिश चर्च कालेज)में दाखिल हो 1881में एफ ए और 1883ई. बी ए परीक्षा पास करी। 1881ई.के नवम्बर माह में नरेंद्र की प्रथम मुलाकात परमहंस रामकृष्ण जी से अपने मित्र सुरेंद्रनाथ के यहाँ मिले थे।
1884ई.में पिता के आकस्मिक निधन के उपरान्त उन्हें गम्भीर आर्थिक संकट झेलने पड़े थे,किन्तु इस कठिन समय में भी विवेक और वैराग्य में कोई कमी नहीं आयी थी!
1885ई. में रामकृष्ण परमहंस कण्ठ रोग(कैंसर) से ग्रस्त हुए,नरेंद्रनाथ अपने गुरुभाईयों के साथ उनकी सेवा और तीव्र आध्यात्मिक साधना में जुट गए।
1886ई. की 16अगस्त को श्रीरामकृष्ण की इहलीला को विराम मिला,इस घटना के कुछ दिनों बाद नरेंद्रनाथ ने अपने गुरुभाईयों के साथ वराहनगर के एक जीर्ण मकान में “रामकृष्ण मठ” की स्थापना करी थी। 1887ई. को इसी मठ में नरेंद्रनाथ और दस गुरुभाईयों ने सन्यास लिया था..स्वामी जी ने सर्वप्रथम विविदिषानन्द नाम ग्रहण किया था,जो कालांतर में विवेकानंद हुआ। 3अगस्त 1890ई. में वो सन्यासी स्वरूप में भ्रमण हेतु निकल पड़े।
स्वामी विवेकानंद 31 मई 1893ई. को अमेरिका के लिए बम्बई से जहाज द्वारा प्रस्थान किये और 25 जुलाई को वैंकूवर पहुंचे।
30 जुलाई की सन्ध्या को रेलमार्ग से शिकागो पहुंचे,वहां से बोस्टन चले गये,हावर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राइट से मिले और राइट को जब पता चला की स्वामी जी के पास परिचय पत्र नहीं है,तब उन्होंने धर्म-सभा कमेटी के चेयरमैन डाॅ.बैरोज के नाम पत्र लिख पास की व्यवस्था करवाई।
11 सितम्बर 1893ई.की दोपहर को अपने सम्बोधन की शुरुआत “अमेरीका निवासी बहनों और भाईयों” से करी..7000 हजार उपस्थित श्रोताओं ने करतल ध्वनि से विपुल अभिनन्दन किया जो ऐतिहासिक स्वागत था।
27 सितम्बर को धर्म-सभा का समापन हुआ और सर्वसम्मत व निर्विरोध स्वामी विवेकानंद जी को सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति घोषित किया गया।सम्पूर्ण अमरीका के अखबारों में चर्चा और गुणगान होने लगे।
1895ई.में वह यूरोप गये..लन्दन और पेरिस के नगरों में धर्म प्रचार के अभियान में लग गये..दिसम्बर में वापस अमरीका चले गये। 1896ई.को पुनः लन्दन आये और दिसम्बर माह में लन्दन से चले..जनवरी 1897ई.को कोलंबो पहुंचे..और 20 जनवरी को कलकत्ता आ गये..अभिनन्दन के बाद अभिनन्दन,कलकत्ता अपने विश्व-विजयी पुत्र के आगमन पर मतवाला हो उठा।
1मई 1897ई. को स्वामी जी ने रामकृष्ण मिशन की औपचारिक रूप से स्थापना करी..1898 को बेलूड मठ की स्थापना हुई थी।
1899ई. की 20 जून को स्वामी जी पुनः पाश्चात्य देशों की यात्रा पर निकले..इग्लैंड होते हुए अमरीका पहुँचे..जहां वह एक वर्ष रहे..पेरिस,वियाना,ऐथेंस और मिस्र होते हुए स्वामी जी 9 दिसम्बर 1900 को बेलूड मठ पहुंचे।
6फरवरी 1901ई. ट्रस्ट डीड की रजिस्ट्री हुई..10 फरवरी को मठ के ट्रस्टियों के अनुमोदन द्वारा स्वामी सारदानन्द महासचिव नियुक्त हुए।इस प्रकार मिशन के समस्त परिचालन के दायित्वों को त्याग कर महासमाधि की ओर तत्पर हो गए।
4 जुलाई 1902ई. को स्वामी जी ने देह त्याग किया..रात्रि 9 बजकर 10 मिनट पर महासमाधि में परिणत हुए।

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