राष्ट्रीय प्रस्तावना न्यूज़ नेटवर्क खीरी : उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जनपद के धौरहरा नगर क्षेत्र में स्थित गोस्वामी संत शिरोमणि तुलसीदास जी महाराज के प्रवास स्थल पर एक ऐसा दिव्य और चमत्कारी वटवृक्ष स्थित है, जो आस्था, इतिहास और प्रकृति के अद्भुत संगम का प्रतीक माना जाता है। लगभग 500 वर्ष पुराना यह विशाल वटवृक्ष श्रद्धालुओं के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।
स्थानीय मान्यताओं और संत परंपरा के अनुसार यह वटवृक्ष स्वयं तुलसीदास जी द्वारा प्रयोग की गई दातून से उत्पन्न हुआ था। समय के साथ यह साधारण दातून एक विशाल, घना और दिव्य स्वरूप धारण कर चुकी है, जिसकी जड़ें धरती में गहराई तक समाई हुई हैं और जो आज भी उसी श्रद्धा के साथ अडिग खड़ी है।
टहनी गिरने से राजा की मृत्यु की मान्यता
स्थानीय महंत चिटकु दास जी बताते हैं कि इस वटवृक्ष से जुड़ी मान्यताएं अत्यंत रहस्यमयी हैं। प्राचीन कथाओं के अनुसार, यदि इस वृक्ष की कोई टहनी स्वतः नीचे गिर जाती थी, तो उस दिशा या क्षेत्र के किसी राजा की मृत्यु हो जाती थी। इस घटना के भय से राजा-महाराजा भी इस वृक्ष के प्रति श्रद्धा और भय दोनों रखते थे और झुकी हुई टहनियों को गिरने से रोकने का प्रयास किया करते थे।
ईंट चढ़ाने की अनोखी परंपरा
इस वटवृक्ष से जुड़ी सबसे अनोखी और प्रचलित परंपरा ईंट चढ़ाने की है। श्रद्धालु वृक्ष की मूल शाखा में ईंट रखकर मन ही मन अपनी मन्नत मांगते हैं। मान्यता है कि मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु पुनः आकर ईंट निकालते हैं और उसके वजन के बराबर प्रसाद का भोग चढ़ाते हैं।
पुजारी बताते हैं कि वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में कोई भी मन्नत अधूरी नहीं रहती। तुलसीदास जी का प्रवास और रचना स्थल धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, गोस्वामी तुलसीदास जी ने सरयू नदी के तट पर स्थित धौरहरा क्षेत्र में लंबे समय तक तपस्या और प्रवास किया था। यहीं उन्होंने रामचरितमानस के बालकांड और सुंदरकांड की रचना की। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, उस समय यह क्षेत्र घने जंगलों और नदियों से घिरा हुआ था और रात्रि के समय “जय श्रीराम” के स्वर सुनाई देने की कथाएं आज भी आस्था का विषय बनी हुई हैं। भक्तों के चमत्कारिक अनुभव धौरहरा निवासी रामू यादव बताते हैं कि पारिवारिक विवाद के कारण उनका घर टूटने की कगार पर था। उन्होंने इस वटवृक्ष पर ईंट चढ़ाकर प्रार्थना की और मात्र तीन माह में परिस्थितियां सामान्य हो गईं। इसी तरह कई व्यापारियों, विद्यार्थियों और परिवारों ने अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने का अनुभव साझा किया है। यही कारण है कि मंगलवार और शनिवार को यहां सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। संरक्षण और पर्यटन की संभावनाएं जिला प्रशासन द्वारा इस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई जा रही है। परिक्रमा पथ, बैठने की व्यवस्था और प्रकाश व्यवस्था जैसे प्रस्तावों पर विचार किया जा रहा है। पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह वटवृक्ष प्राकृतिक संरक्षण का जीवंत उदाहरण है, जो बिना विशेष देखभाल के सदियों से फल-फूल रहा है। धौरहरा ब्लॉक प्रमुख ने इसे जनपद की सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए संरक्षण का आश्वासन दिया है। आस्था और इतिहास का संगम धौरहरा का यह पावन स्थल न केवल तुलसीदास जी की भक्ति और तपस्या की स्मृति को संजोए हुए है, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए विश्वास और आशा का केंद्र भी है। यहां आकर भक्त न केवल आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं, बल्कि अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना भी करते हैं।













































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































