वेनेजुएला को लेकर अमेरिका से आई खबरों और बयानों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों के बाद यह सवाल उठने लगा है कि वेनेजुएला के बाद अब अगला निशाना कौन सा देश हो सकता है। यूरोप से लेकर लैटिन अमेरिका तक, कई देशों में चिंता का माहौल है।

अमेरिकी प्रशासन की ओर से वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई को लेकर किए गए दावों के बाद राष्ट्रपति ट्रंप लगातार सख्त बयान दे रहे हैं। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका अपने हितों और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। इसी कड़ी में उन्होंने कई देशों का नाम लेकर चेतावनी दी है।

सबसे पहले बात कोलंबिया की।
एयर फोर्स वन में बातचीत के दौरान ट्रंप ने कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कोलंबिया गलत नीतियों के कारण संकट में है और जब उनसे पूछा गया कि क्या वहां किसी तरह की कार्रवाई हो सकती है, तो ट्रंप ने इसे खारिज करने के बजाय खुला जवाब दिया।

ईरान पर भी ट्रंप का रुख कड़ा दिखा।
ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर टिप्पणी करते हुए ट्रंप ने कहा कि अगर वहां हिंसा बढ़ती है तो अमेरिका सख्त प्रतिक्रिया दे सकता है। उनके इस बयान को पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ाने वाला माना जा रहा है।

क्यूबा को लेकर ट्रंप ने अलग अंदाज़ अपनाया।
उन्होंने कहा कि क्यूबा पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसे कमजोर करने के लिए अमेरिका को सैन्य कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। हालांकि, अमेरिकी विदेश मंत्रालय के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने क्यूबा को अब भी एक “बड़ी चुनौती” बताया है।

सबसे ज्यादा चिंता यूरोप में ग्रीनलैंड को लेकर देखी जा रही है।
ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की इच्छा जताई और इसे अमेरिकी सुरक्षा के लिए जरूरी बताया। डेनमार्क ने इन बयानों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। ट्रंप के इन बयानों से यूरोपीय देशों में असहजता बढ़ गई है।

वहीं, वेनेजुएला को लेकर ट्रंप ने यह भी कहा है कि वहां अमेरिका का प्रभाव बना हुआ है और अंतरिम नेतृत्व को भी चेतावनी दी गई है कि अमेरिकी मांगों की अनदेखी के गंभीर नतीजे हो सकते हैं।

कुल मिलाकर, वेनेजुएला को लेकर किए गए दावों के बाद ट्रंप के बयानों ने कोलंबिया, ईरान, क्यूबा और ग्रीनलैंड जैसे देशों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि ये बयान सिर्फ शब्दों तक सीमित रहते हैं या वैश्विक राजनीति में कोई बड़ा कदम देखने को मिलता है।

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