वैष्णवाचार्य पुंडरीक गोस्वामी महाराज आज भारतीय अध्यात्म में एक ऐसे संत के रूप में पहचाने जाते हैं, जिन्होंने धर्म को केवल प्रवचन तक सीमित न रखकर उसे समाज, शिक्षा और समरसता से जोड़ा है। वृंदावन स्थित राधारमण मंदिर के 38वें आचार्य के रूप में उन्होंने वैष्णव परंपरा को आधुनिक सामाजिक सरोकारों के साथ आगे बढ़ाया है।

भागवत, रामकथा, गोपीगीत और गीता पर उनके प्रवचन केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद के मंच बन चुके हैं। वे देश-विदेश में जाकर संस्कार, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का प्रचार करते हैं। उनकी कथाओं में भक्ति के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का स्पष्ट संदेश देखने को मिलता है।

उनका सबसे उल्लेखनीय सामाजिक योगदान ‘निमाई पाठशाला’ के रूप में सामने आया है। इस पहल से अब तक दो लाख से अधिक विद्यार्थी निशुल्क जुड़े हैं। यह पाठशाला जाति, वर्ग और आयु की सीमाओं से परे सभी के लिए खुली है। शिक्षा और संस्कार के इस प्रयोग की सराहना संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में भी की गई, जहां इसकी जानकारी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने प्रस्तुत की गई।

पुंडरीक गोस्वामी महाराज ने यह सिद्ध किया है कि धर्म समाज को जोड़ने की शक्ति रखता है। उपराष्ट्रपति भवन में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन करने वाले वे देश के पहले व्यास हैं। यह आयोजन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की गरिमा और उसकी संवैधानिक स्वीकार्यता का प्रतीक माना गया। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के प्रांगण में पहली भागवत कथा और हरिद्वार की हर की पैड़ी पर तीन दिवसीय गीता सत्संग के माध्यम से उन्होंने गंगा, संस्कृति और राष्ट्र चेतना को एक सूत्र में पिरोया। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के भूमि पूजन और प्राण प्रतिष्ठा समारोह में उन्होंने वैष्णव धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रमुख गुरुओं के साथ पहली पंक्ति में स्थान प्राप्त किया।

मोरारी बापू, रमेश भाई ओझा, स्वामी रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, स्वामी चिदानंद सरस्वती सहित अनेक प्रतिष्ठित संतों द्वारा उनसे कथा सुनी जाना उनकी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को दर्शाता है। मोरारी बापू द्वारा दिया गया तुलसी अवार्ड उनके योगदान की औपचारिक मान्यता है। ऑक्सफोर्ड से अध्ययन, धर्मशास्त्र में गहरी पकड़ और डॉक्टरेट की उपाधि के साथ पुंडरीक गोस्वामी महाराज आज हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी में वैश्विक स्तर पर भारतीय दर्शन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वे उस परंपरा के वाहक हैं, जिसमें धर्म समाज के साथ चलता है, समाज से कटता नहीं।

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