“लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ कांग्रेस का अविश्वास प्रस्ताव चर्चा में है। जानें स्पीकर को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया, अब तक का इतिहास और विपक्ष के आरोप।“
हाइलाइट्स :
- कांग्रेस ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया
- 118 सांसदों का समर्थन, विपक्ष ने पक्षपात का आरोप लगाया
- संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत तय है स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया
- लोकसभा इतिहास में अब तक कोई भी अविश्वास प्रस्ताव सफल नहीं
- राहुल गांधी को बोलने न देने और सांसदों के निलंबन से बढ़ा विवाद
- लोकसभा इतिहास में अब तक कोई भी अविश्वास प्रस्ताव सफल नहीं
नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र 2026 के दौरान लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ने भारतीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस पार्टी ने स्पीकर के खिलाफ नोटिस सौंपा है, जिसे 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन मिलने का दावा किया गया है। विपक्ष का आरोप है कि लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका निष्पक्ष न होकर सत्तारूढ़ दल के पक्ष में झुकी हुई है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब संसद में बजट पर चर्चा होनी थी, लेकिन लगातार हंगामे और कार्यवाही स्थगित होने से संसदीय कामकाज प्रभावित हो रहा है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
दरअसल, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अपना भाषण पूरा करने की अनुमति नहीं दी गई। राहुल गांधी कथित तौर पर पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब और उससे जुड़े राजनीतिक संदर्भों पर बोलना चाहते थे।
इसके बाद सदन में भारी हंगामा हुआ, जिसके चलते कांग्रेस के 7 सांसदों समेत कुल 8 सांसदों को निलंबित कर दिया गया। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताते हुए स्पीकर पर सीधा आरोप लगाया।
प्रियंका गांधी का बयान
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा—
“स्पीकर साहब पर दबाव है, इसलिए उन्हें बार-बार सफाई देनी पड़ रही है। यह संसदीय गरिमा के खिलाफ है। प्रधानमंत्री सदन में उपस्थित नहीं थे और उनकी अनुपस्थिति का बोझ स्पीकर पर डाल दिया गया।”
विपक्ष का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष को सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन बनाना चाहिए, न कि किसी एक पक्ष का प्रतिनिधि बनना चाहिए।
लोकसभा स्पीकर को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 और लोकसभा के कार्य संचालन नियम 200 के अनुसार—
- स्पीकर को हटाने के लिए लिखित नोटिस लोकसभा महासचिव को देना होता है
- प्रस्ताव को कम से कम 50 सांसदों का समर्थन अनिवार्य
- नोटिस के 14 दिन बाद प्रस्ताव पर चर्चा संभव
- चर्चा और मतदान के दौरान स्पीकर अध्यक्षता नहीं कर सकते
- प्रस्ताव पारित होने के लिए सदन के कुल सदस्यों का बहुमत आवश्यक
इतिहास क्या कहता है?
लोकसभा के इतिहास में अब तक तीन बार औपचारिक रूप से स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया—
- 1954 – जी.वी. मावलंकर (खारिज)
- 1966 – हुकम सिंह (समर्थन की कमी)
- 1987 – बलराम जाखड़ (बहस के बाद अस्वीकार)
इसके अलावा, मीरा कुमार, जी.एम.सी. बालयोगी और ओम बिरला के खिलाफ भी अलग-अलग समय पर नोटिस चर्चा में रहे, लेकिन कोई प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।
क्या प्रस्ताव पास हो सकता है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मौजूदा लोकसभा में एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत है। ऐसे में प्रस्ताव का पारित होना लगभग असंभव माना जा रहा है। हालांकि विपक्ष इसे—
- लोकतंत्र की रक्षा
- संसदीय परंपराओं
- और राजनीतिक नैरेटिव बनाने के रूप में देख रहा है।
राजनीतिक मायने क्या हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अविश्वास प्रस्ताव—
- सरकार पर नैतिक दबाव बनाने
- चुनावी माहौल में विपक्ष की एकजुटता दिखाने
- और संसद के भीतर सत्ता बनाम विपक्ष की लड़ाई को तेज करने का माध्यम बन सकता है।
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