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“लखनऊ मेयर सुषमा खर्कवाल और नगर आयुक्त गौरव कुमार के बीच टकराव बढ़ गया है। मेयर ने विकास कार्यों की फाइलों पर साइन करने से इनकार कर दिया। नगर आयुक्त बोले, “छह महीने के भीतर दोबारा सदन बुलाना नियम विरुद्ध है।” विवाद से शहर के विकास कार्य ठप पड़े हैं।”

लखनऊ। नगर निगम लखनऊ में मेयर सुषमा खर्कवाल और नगर आयुक्त गौरव कुमार के बीच टकराव अब खुलकर सामने आ गया है। विवाद उस वक्त गहराया जब मेयर ने जनता के मुद्दों से जुड़ी विकास कार्यों की फाइलें लौटाते हुए साइन करने से इनकार कर दिया। 4 और 9 सितंबर को हुई नगर निगम की सामान्य सदन बैठक में कई प्रस्तावों को मंजूरी दी गई थी।

इन प्रस्तावों पर नगर निगम प्रशासन ने मिनट्स तैयार कर मेयर के पास सिग्नेचर के लिए भेजे, लेकिन मेयर ने फाइल लौटाते हुए कहा कि इन मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई।

मेयर ने यह भी आरोप लगाया कि फाइल चपरासी के हाथ भेजी गई और बाद में ईमेल पर भेज दी गई, जिससे प्रक्रिया की गंभीरता पर सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि एजेंडों पर फिर से सदन बुलाया जाए ताकि पार्षदों की राय ली जा सके।

इस पर नगर आयुक्त गौरव कुमार ने कड़ा जवाब देते हुए कहा—

“नियम-28 के अनुसार किसी प्रस्ताव पर छह महीने तक दोबारा चर्चा नहीं की जा सकती। ऐसा करना सदन की अवमानना होगी।”

इस विवाद के चलते 14 नवंबर को प्रस्तावित कार्यकारिणी बैठक पर भी असमंजस की स्थिति है।
शहर के विकास कार्य और पुनरीक्षित बजट दोनों अटक गए हैं, जिससे पार्षदों में नाराज़गी है।

जानकारों के मुताबिक, इस “अधिकारों की जंग” ने नगर निगम के भीतर तनातनी का माहौल बना दिया है।
प्रभारी मंत्री सुरेश खन्ना ने भी दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने की कोशिश की थी, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।

मेयर सुषमा खर्कवाल अब पार्षदों को एकजुट कर रही हैं और 14 नवंबर की कार्यकारिणी बैठक में अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खुलने की संभावना जताई जा रही है। वहीं शासन स्तर पर भी इस विवाद पर नाराजगी जताई गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गतिरोध नहीं टूटा तो लखनऊ के कई विकास प्रोजेक्ट्स पर असर पड़ सकता है।

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