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लखनऊ में एक वरिष्ठ पत्रकार का मतदाता सूची से नाम डिलीट होने का मामला सामने आया है। 2003 से वोटर रहे पत्रकार की पर्ची नहीं आई, जबकि परिवार के बाकी सदस्यों का नाम मौजूद है। एसआईआर प्रक्रिया की गंभीर लापरवाही उजागर।

लखनऊ। मतदाता सूची से नाम डिलीट होने का एक गंभीर मामला राजधानी लखनऊ में सामने आया है। उत्तर प्रदेश में जारी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि इस बार पर्चियां तो घर-घर पहुंच रही हैं, लेकिन कई मतदाताओं का नाम सूची से हटा दिया जा रहा है।

ऐसा ही मामला राजधानी के विधानसभा क्षेत्र 173—लखनऊ ईस्ट, संजय गांधी पुरम के वरिष्ठ पत्रकार शेखर पंडित के साथ हुआ है। राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त शेखर पंडित के घर बीएलओ पर्चियां लेकर पहुंचे, पर उनकी पर्ची ही नहीं थी। जांच में पता चला कि उनका नाम मेन इलेक्टोरल रोल से ही डिलीट कर दिया गया है, जबकि उनके पिता और पत्नी दोनों की वोटर लिस्ट में एंट्री मौजूद है।

सबसे बड़ी बात यह कि नाम डिलीट करने के लिए न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही कोई सत्यापन किया गया। इससे यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि जब राजधानी के मान्यता प्राप्त पत्रकार का नाम बिना सूचना हटाया जा रहा है, तो ग्रामीण क्षेत्रों के साधारण या अशिक्षित मतदाताओं का क्या हाल होगा?

मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा दावा कर रहे हैं कि मतदाता सूची पुनरीक्षण गंभीरता, पारदर्शिता और तेजी से हो रहा है। लेकिन यह घटना उनके दावों पर सीधा सवाल खड़ा करती है।

मतदाता सूची से कोई नाम बिना जानकारी हट जाना व्यक्ति के मताधिकार पर प्रत्यक्ष प्रहार है।
और पत्रकार जैसा जागरूक नागरिक भी ऐसी गलती का शिकार हो सकता है तो आम मतदाता किस भरोसे रहे?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह की चूकें जारी रहीं, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में हजारों मतदाता मतदान से वंचित रह सकते हैं। SIR प्रक्रिया का उद्देश्य नये वोटर जोड़ना और गलतियां सुधारना था, लेकिन सिस्टम की लापरवाही उल्टा लोकतंत्र की नींव को ही कमजोर कर रही है।

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विशेष संवाददाता – मनोज शुक्ल

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