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“पीडीए में हुई एम की एंट्री? अखिलेश यादव द्वारा इटावा के केदारेश्वर महादेव मंदिर का वीडियो साझा करने के बाद यूपी की राजनीति में नया विमर्श तेज। जानिए मंदिर राजनीति, PDAM समीकरण और 2027 चुनावी संकेत।”

हाइलाइट्स :

  • अखिलेश यादव ने इटावा के केदारेश्वर महादेव मंदिर का वीडियो किया साझा
  • पीडीए के साथ अब ‘एम’ यानी मंदिर जोड़ने की चर्चा तेज
  • संजय निषाद ने मंदिर को बताया चुनावी और राजनीतिक
  • 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सपा की बदली रणनीति के संकेत
  • PDAM (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक-मंदिर) बना नया सियासी फार्मूला

अभयानंद शुक्ल
कार्यकारी संपादक

लखनऊ।  पीडीए में हुई एम की एंट्री? उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह सवाल इन दिनों तेजी से चर्चा में है। समाजवादी पार्टी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हालिया सोशल मीडिया पोस्ट ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। अखिलेश यादव ने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर इटावा के चंबल क्षेत्र में निर्माणाधीन केदारेश्वर महादेव मंदिर का वीडियो साझा किया है।

पोस्ट के साथ उन्होंने लिखा—
“जब कोई अदृश्य करवाता है, तभी ऐसा बड़ा काम आकार पाता है और दृश्यमान हो जाता है।”

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सपा की रणनीतिक पुनर्संरचना का संकेत भी है।

 पीडीए से PDAM की ओर अखिलेश?

अब तक पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA राजनीति करने वाले अखिलेश यादव के इस कदम को हिंदुत्व के साथ संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों के अनुसार, सपा नेतृत्व को यह एहसास हो चुका है कि केवल पीडीए समीकरण से सत्ता तक पहुंचना मुश्किल है, इसलिए अब उसमें ‘एम’ यानी मंदिर का तड़का जोड़ा जा रहा है।

 केदारेश्वर महादेव मंदिर की विशेषताएं

  • मंदिर निर्माण में सीमेंट और सरिया का प्रयोग नहीं
  • पत्थर तमिलनाडु और केरल से मंगवाए गए
  • वास्तुकला राम मंदिर की परंपरागत शैली से प्रेरित
  • पहले यहां कृष्ण मंदिर बनाने की योजना थी

 विरोधियों के तीखे बयान

इस पोस्ट के बाद सत्ता पक्ष की ओर से प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं।

  • संजय निषाद (कैबिनेट मंत्री, यूपी सरकार) ने इसे राजनीतिक मंदिर करार दिया
  • बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि यह केदारनाथ मंदिर की नकल है

 पार्टी के भीतर भी दिख रहा बदलाव

अयोध्या सांसद अवधेश प्रसाद पासी पहले ही कई बार रामलला के दर्शन कर चुके हैं और मंदिर निर्माण की सराहना भी कर चुके हैं। इससे साफ है कि सपा के भीतर यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आगे बढ़ रही प्रक्रिया है।

क्या भोलेनाथ के जरिए साधेंगे संतुलन?

सनातन परंपरा में भगवान शिव को मध्यमार्गी माना जाता है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अखिलेश यादव ने राम मंदिर से दूरी रखते हुए भोलेनाथ को चुना, ताकि वे सभी वर्गों को संतुलित संदेश दे सकें।

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