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असदुद्दीन ओवैसी महाराष्ट्र निकाय चुनाव में शानदार प्रदर्शन के बाद भारतीय मुस्लिम राजनीति में अचानक महत्वपूर्ण हो गए हैं। सपा, असम और बंगाल में गठबंधन की चर्चाएं तेज। पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

हाइलाइट्स :

  • महाराष्ट्र निकाय चुनाव में AIMIM ने 125 से ज्यादा पार्षद जिताए
  • सपा के साथ चुनावी गठबंधन की चर्चाएं तेज
  • असम में बदरुद्दीन अजमल और बंगाल में हुमायूं कबीर समर्थन को तैयार
  • मुस्लिम वोटों के बंटवारे को रोकने की रणनीति पर मंथन
  • इंडी गठबंधन में ओवैसी की भूमिका पर बहस तेज

अभयानंद शुक्ल
कार्यकारी सम्पादक

लखनऊ। असदुद्दीन ओवैसी भारत की मुस्लिम राजनीति में अचानक सबसे अहम चेहरा बनकर उभरे हैं। कभी इंडी गठबंधन में शामिल होने के लिए लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने वाले ओवैसी आज उस स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल उन्हें अपने साथ जोड़ने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

महाराष्ट्र के हालिया निकाय चुनावों में AIMIM के दमदार प्रदर्शन ने देश की राजनीति में नया समीकरण खड़ा कर दिया है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और एनसीपी जैसे दलों को पीछे छोड़ते हुए AIMIM ने अकेले 125 से अधिक पार्षद जिता दिए, जिसके बाद खासतौर पर चुनावी राज्यों में मुस्लिम मतों के दावेदार दलों की बेचैनी बढ़ गई है।

समाजवादी पार्टी की 20 जनवरी को हुई बैठक के बाद ओवैसी को लेकर चर्चाएं और तेज हो गईं। बैठक से बाहर निकलते हुए सपा सांसद रमाशंकर राजभर ने कहा कि भाजपा को हराने के लिए जो भी साथ आएगा, उसका स्वागत है। सूत्रों के अनुसार, 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा हुई, जिसमें AIMIM का नाम भी सामने आया।

बैठक में यह भी माना गया कि बिहार की तरह ओवैसी को नजरअंदाज करना या उनके खिलाफ प्रचार करना नुकसानदेह हो सकता है। नेताओं का मानना है कि मुस्लिम वोटों का विभाजन रोकने के लिए ओवैसी को साथ लेकर चलना रणनीतिक रूप से सही हो सकता है।

हालांकि, सपा प्रमुख अखिलेश यादव की सोशल मीडिया पोस्ट—“37 से मिलेगी 27 की जीत”—में ओवैसी को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं था। वहीं, सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव ने साफ कहा कि पार्टी को ओवैसी की जरूरत नहीं है और सपा अपने दम पर चुनाव जीतने में सक्षम है।

उधर AIMIM के प्रवक्ताओं ने सपा पर दोहरे रवैये का आरोप लगाया। प्रवक्ता आसिम वकार ने कहा कि पहले न्योता दिया जाता है और फिर दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। शादाब चौहान ने आरोप लगाया कि सपा सांसदों को ओवैसी को बदनाम करने की ट्रेनिंग दी गई है। वहीं वारिस पठान ने तंज कसते हुए कहा कि सपा की साइकिल के दोनों पहिए टूट चुके हैं।

भाजपा ने भी इस मुद्दे पर चुटकी ली। प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि सपा अब दूसरों के सहारे यूपी की चुनावी नैया पार करना चाहती है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, महाराष्ट्र की जीत के बाद ओवैसी अब सिर्फ एक क्षेत्रीय नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य मुस्लिम नेता के रूप में उभर रहे हैं। यही वजह है कि असम में AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल और पश्चिम बंगाल में हुमायूं कबीर भी ओवैसी के साथ चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं।

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