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ब्रजेश पाठक बटुक सम्मान लखनऊ कार्यक्रम में यूपी के डिप्टी सीएम ने 101 बटुकों का पूजन किया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद और शिखा प्रकरण के बीच इसे डैमेज कंट्रोल और ब्राह्मण राजनीति से जोड़ा जा रहा है।

हाइलाइट्स:

  • डिप्टी सीएम ने लखनऊ आवास पर 101 बटुकों का सम्मान किया
  • पत्नी नम्रता पाठक के साथ तिलक लगाकर किया पूजन
  • स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद के बीच सियासी संदेश
  • शिखा खींचने वालों को बताया था ‘महापापी’
  • यूपी में ब्राह्मण राजनीति को लेकर बढ़ी हलचल

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने गुरुवार को अपने सरकारी आवास पर 101 ब्राह्मण बटुकों का पूजन और सम्मान किया। उन्होंने पत्नी नम्रता पाठक के साथ बटुकों के माथे पर तिलक लगाया, पुष्पवर्षा की और हाथ जोड़कर उनका अभिनंदन किया। इस दौरान बटुकों ने वैदिक मंत्रोच्चार किया और वातावरण धार्मिक अनुष्ठान जैसा रहा।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद के बीच आयोजन

राजनीतिक हलकों में इस कार्यक्रम को प्रयागराज के माघ मेले से जुड़े विवाद और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण के बाद ‘डैमेज कंट्रोल’ की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में बटुकों की शिखा खींचने की घटना पर पाठक ने सार्वजनिक रूप से कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित पुलिसकर्मियों को ‘पापी’ कहा था और कार्रवाई की मांग की थी।

उन्होंने 17 फरवरी को एक कार्यक्रम में कहा था कि “जिन लोगों ने बाल ब्राह्मणों की शिखा खींची है, उन्हें महापाप लगेगा और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।” इस बयान ने प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी थी।

ब्राह्मण राजनीति का संदेश?

विश्लेषकों का मानना है कि बसपा और सपा द्वारा ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिशों के बीच यह आयोजन एक राजनीतिक संदेश भी है। हाल के दिनों में बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर टिप्पणी की थी, जिससे राजनीतिक बहस तेज हो गई।

इस मुद्दे पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती ने भी सरकार को घेरने का प्रयास किया। ऐसे माहौल में पाठक का बटुक पूजन कार्यक्रम राजनीतिक संकेतों से जोड़कर देखा जा रहा है।

‘सम्मान और परंपरा की रक्षा’ का संदेश

उपमुख्यमंत्री के आवास पर पहुंचे बटुकों ने उनका आभार जताया और कहा कि उन्होंने ब्राह्मण समाज से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी है। पाठक ने भी कहा कि समाज की परंपराओं और सम्मान की रक्षा जरूरी है।

प्रदेश में प्रतीकात्मक राजनीति के इस दौर में ब्रजेश पाठक का यह आयोजन न सिर्फ विवाद के बाद संतुलन साधने का प्रयास माना जा रहा है, बल्कि उन्हें एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के रूप में स्थापित करने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है।

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