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ब्राह्मण विधायकों का सहभोज उत्तर प्रदेश भाजपा में बड़ा सियासी संकेत बन गया है। क्या यह आयोजन योगी आदित्यनाथ की छवि को नुकसान पहुंचाने की रणनीति है? पढ़िए पूरी राजनीतिक पड़ताल।”””

भाजपा के अंदर चल रहे कोल्ड वॉर की एक और कड़ी

अभयानंद शुक्ल
समन्वय सम्पादक

लखनऊ। बीते मंगलवार को हुए भाजपा के ब्राह्मण विधायकों के सहभोज ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अचानक उबाल ला दिया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी द्वारा इस बैठक पर सख्त रुख अपनाए जाने के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि आखिर यह पूरा विवाद किसके हित में है और किसे इससे राजनीतिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो रही है।

यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि इसी तरह की एक बैठक विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान भी हुई थी, लेकिन तब न तो कोई कार्रवाई हुई और न ही कोई विवाद खड़ा हुआ। इससे साफ है कि मामला सिर्फ सहभोज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक उद्देश्य छिपा हो सकता है।

भाजपा के अंदरूनी समीकरण और दिल्ली फैक्टर

भाजपा के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद पार्टी में नेतृत्व को लेकर दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहते हैं—केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। सूत्रों के मुताबिक, इन दोनों के समर्थकों के बीच नैरेटिव की जंग लंबे समय से चल रही है, भले ही वह सार्वजनिक तौर पर नजर न आती हो।

इसी संदर्भ में यह भी याद दिलाना जरूरी है कि कुछ समय पहले राजपूत विधायकों का ‘कुटुंब मिलन’ भी हुआ था, जिस पर चर्चा तो हुई, लेकिन न तो उसे विवादित बनाया गया और न ही तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष ने कोई संज्ञान लिया। ऐसे में ब्राह्मण विधायकों के सहभोज पर अचानक कार्रवाई होना कई सवाल खड़े करता है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम इस नैरेटिव को मजबूत करने की कोशिश हो सकता है कि योगी सरकार में ब्राह्मणों की अनदेखी हो रही है और मुख्यमंत्री सिर्फ एक खास वर्ग के विधायकों की सुनते हैं। चूंकि योगी के खिलाफ ‘एंटी ब्राह्मण’ होने का आरोप पहले से ही कुछ हलकों में चल रहा है, ऐसे में यह मामला उस नैरेटिव को धार देने का जरिया बन सकता है।

प्रदेश अध्यक्ष की तत्परता और उसके निहितार्थ

नये प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की इस मामले में दिखाई गई तेजी भी चर्चा का विषय है। सवाल यह है कि यदि सहभोज पार्टी संविधान और नीतियों के खिलाफ था, तो फिर उनके आवास पर हुई कुर्मी-क्षत्रिय नेताओं की बैठक को कैसे सही ठहराया गया? इस विरोधाभास ने कार्रवाई की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह भी सर्वविदित है कि पंकज चौधरी योगी आदित्यनाथ की पहली पसंद नहीं थे। मुख्यमंत्री योगी अपने विश्वस्त स्वतंत्रदेव सिंह को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पक्ष में थे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पंकज चौधरी का राजनीतिक रिमोट किसके हाथ में है।

सूत्रों के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पंकज चौधरी द्वारा मुख्यमंत्री योगी के पैर छूना भी एक पूर्व निर्धारित राजनीतिक संदेश था, ताकि सार्वजनिक रूप से यह दिखाया जा सके कि दोनों के बीच कोई मतभेद नहीं है। लेकिन यदि प्रदेश अध्यक्ष के फैसलों से योगी की छवि को नुकसान पहुंचता है, तो उसका असर अंततः मुख्यमंत्री पर ही पड़ेगा—और शायद यही रणनीति का हिस्सा है।

बृजभूषण शरण सिंह की एंट्री और संकेत

इस पूरे घटनाक्रम में गोंडा के पूर्व सांसद और मुख्यमंत्री योगी के मुखर आलोचक रहे बृजभूषण शरण सिंह की टिप्पणी भी महज संयोग नहीं मानी जा रही। उन्होंने साफ कहा कि यदि ब्राह्मण विधायक एक साथ बैठकर भोजन करते हैं और आपस में अपनी बातें साझा करते हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है—बशर्ते उन्होंने न तो पार्टी और न ही मुख्यमंत्री के खिलाफ कुछ कहा हो।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब इस मामले में प्रदेश अध्यक्ष क्या निर्णय लेते हैं, यह उनका विवेक है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान परोक्ष रूप से उन विधायकों और उनकी कथित नाराजगी के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। यदि प्रदेश अध्यक्ष और बृजभूषण शरण सिंह के राजनीतिक संबंधों को ऊपर के स्तर पर जोड़ा जाए, तो तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट हो जाती है।

योगी की चुप्पी और आगे की राजनीति

इस पूरे विवाद में सबसे अहम बात यह है कि न तो भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी है और न ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने। यह चुप्पी खुद में बहुत कुछ कहती है। माना जा रहा है कि योगी इस पूरे खेल को भली-भांति समझ रहे हैं और इसलिए फिलहाल संयम बरत रहे हैं।

हालांकि, यह भी चिंता का विषय है कि सोशल मीडिया पर उनके अति उत्साही समर्थक कहीं अनावश्यक बयानबाजी कर उनके लिए मुश्किलें न खड़ी कर दें। पार्टी के भीतर और बाहर योगी के विरोधियों की संख्या कम नहीं है और हर छोटी चूक को बड़ा मुद्दा बनाया जा सकता है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, ब्राह्मण विधायकों का सहभोज जितना सरल आयोजन दिखता है, उससे कहीं अधिक गहरे राजनीतिक संकेत देता है। यह मामला भाजपा के भीतर चल रहे वर्चस्व के कोल्ड वॉर का हिस्सा प्रतीत होता है। यह लड़ाई यहीं थमने वाली नहीं दिखती, क्योंकि योगी आदित्यनाथ अपनी राजनीतिक जिद और रणनीतिक फैसलों के लिए जाने जाते हैं। हालिया प्रशासनिक उदाहरण बताते हैं कि जब वे ठान लेते हैं, तो रास्ता निकाल ही लेते हैं।

अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में यह नैरेटिव किस दिशा में जाता है और भाजपा के भीतर यह खींचतान किसे मजबूत करती है और किसे कमजोर।

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