राष्ट्रपति की शाही बग्घी, राजपथ शाही बग्घी, गणतंत्र दिवस बग्घी, शाही बग्घी की कहानी, माउंटबेटन बग्घी, भारत की शाही विरासत, राष्ट्रपति की बग्घी इतिहास, Republic Day shahi bagghi,President’s royal carriage, Rashtrapati Shahi Bagghi, Republic Day carriage history, Mountbatten carriage India, royal carriage India, presidential carriage story,राष्ट्रपति की शाही बग्घी फोटो, राजपथ बग्घी इमेज, गणतंत्र दिवस शाही बग्घी, शाही बग्घी की तस्वीर, माउंटबेटन बग्घी इमेज,President’s royal carriage image, Republic Day carriage photo, Rashtrapati Bhavan royal carriage, Mountbatten carriage picture,President’s royal carriage image, Republic Day carriage photo, Rashtrapati Bhavan royal carriage, Mountbatten carriage picture,#RepublicDay, #RashtrapatiKiShahiBagghi, #Rajpath, #RashtrapatiBhavan, #RepublicDay2026, #IndianHeritage, #MountbattenCarriage, #IndiaHistory, #NationalPride,

राष्ट्रपति की शाही बग्घी की कहानी जानिए: कैसे ब्रिटिश वायसराय माउंटबेटन की बग्घी आजादी के बाद भारत की विरासत बनी, और सिक्के की टॉस से तय हुआ इसका मालिकाना।

नई दिल्ली। गणतंत्र दिवस की सुबह हो और राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर राष्ट्रपति की शाही बग्घी न निकले—तो जैसे उत्सव अधूरा रह जाए। बग्घी की भव्यता, सुनहरे नक्काशीदार हिस्से, घोड़ों की तेज़ चाल और परेड की गरिमा—यह सब हमें देश के संविधान और लोकतंत्र की ताकत का एहसास कराता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस बग्घी के पीछे एक ऐसा इतिहास छिपा है जो आज भी रोमांचित कर देता है?

ब्रिटिश राज की शाही विरासत

यह बग्घी ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की शान हुआ करती थी। वायसराय के समय में यह बग्घी सिर्फ एक वाहन नहीं थी, बल्कि सत्ता और वैभव का प्रतीक थी। उस समय की शाही चमक और भव्यता आज भी इस बग्घी में दिखती है।

आज़ादी और बंटवारे का बड़ा विवाद

1947 में भारत को आज़ादी मिली, लेकिन उसी समय भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे की प्रक्रिया शुरू हुई।
दोनों देशों के बीच कई ऐतिहासिक वस्तुओं को लेकर विवाद हुआ। और इसी विवाद का एक बड़ा हिस्सा थी यह शाही बग्घी

दोनों देश इसे अपने पास रखना चाहते थे, लेकिन कोई स्पष्ट निर्णय नहीं बन पा रहा था। कागजी बहस और तर्कों के बीच मामला इतना उलझा कि प्रशासन भी परेशान हो गया।

फैसला किस्मत पर छोड़ दिया गया

अंत में दोनों पक्षों ने एक अनोखा निर्णय लिया—
यह फैसला किस्मत पर छोड़ दिया जाएगा।

यानी, इसे “लकी ड्रा” की तरह टाला नहीं जा सकता था, बल्कि इसे सिक्के की टॉस से तय किया गया।

  • भारत की ओर: मेजर गोविंद सिंह
  • पाकिस्तान की ओर: मेजर याकूब खां

और जब सिक्का उछला…
सिक्का भारत के पक्ष में गिरा

यही वह क्षण था जब यह शाही बग्घी भारत की विरासत बन गई।

बग्घी बन गई भारत की शान

आज यह बग्घी सिर्फ एक ऐतिहासिक वस्तु नहीं रही—
यह राष्ट्रपति की शान बन गई और गणतंत्र दिवस पर देश की गरिमा का प्रतीक बनकर सामने आती है।

जब राष्ट्रपति इसी बग्घी में सवार होकर कर्तव्य पथ पर चलती है, तो वह दृश्य हमें याद दिलाता है:

  • हमारी आज़ादी की कीमत
  • हमारी परंपरा और सम्मान
  • और वह संघर्ष जिसमें देश ने अपनी पहचान बनाई

गणतंत्र दिवस की परंपरा का प्रतीक

इस बग्घी का सफर हमें यह सिखाता है कि
इतिहास केवल किताबों में नहीं, परेड की रफ्तार में भी जिंदा रहता है।

हर बार जब यह बग्घी राजपथ पर निकलती है, तो वह हमें याद दिलाती है कि:

भारत की शान सिर्फ शक्ति नहीं, बल्कि उसकी परंपरा, संविधान और लोकतंत्र है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *