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“उत्तर प्रदेश में ठाकुर विधायकों की बैठक के बाद अब ब्राह्मण विधायकों ने ‘कुटुम्ब’ बनाकर शक्ति प्रदर्शन किया। लखनऊ में 50 विधायकों की बंद कमरे बैठक से भाजपा और योगी सरकार की राजनीति में हलचल तेज।”

रिपोर्ट : मनोज शुक्ल

हाइलाइट्स:

  • ठाकुर विधायकों की बैठक के बाद अब ब्राह्मण विधायकों की गोलबंदी
  • लखनऊ में बंद कमरे में 45–50 ब्राह्मण विधायक एक साथ बैठे
  • सरकार और संगठन में अनदेखी का आरोप, ‘सुनवाई नहीं’ की शिकायत
  • डिप्टी CM ब्रजेश पाठक को ‘ताकत न मिलने’ का मुद्दा उठा
  • जनवरी में फिर होगी बड़ी बैठक, सियासी रणनीति तय होगी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों को लेकर हलचल एक बार फिर तेज हो गई है। विधानमंडल के शीतकालीन सत्र के बीच पहले ठाकुर समाज के विधायकों की बैठक और अब ब्राह्मण विधायकों के ‘कुटुम्ब’ सहभोज ने सत्तारूढ़ भाजपा और योगी सरकार के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

मंगलवार शाम कुशीनगर से भाजपा विधायक पीएन पाठक के लखनऊ स्थित आवास पर आयोजित इस बैठक में पूर्वांचल और बुंदेलखंड के 45 से 50 ब्राह्मण विधायक शामिल हुए। बैठक को औपचारिक रूप से सहभोज बताया गया, लेकिन इसके सियासी मायने गहरे माने जा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, बैठक में यह बात प्रमुखता से उठी कि सरकार, संगठन और संघ में ब्राह्मण समाज की सुनवाई लगातार कम हो रही है। विधायकों ने चिंता जताई कि पार्टी के भीतर एक जाति विशेष को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है, जबकि परंपरागत रूप से भाजपा के साथ खड़ा रहा ब्राह्मण समाज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है।

बैठक में यह मुद्दा भी उठा कि ब्रजेश पाठक को डिप्टी सीएम बनाए जाने के बावजूद उन्हें अपेक्षित राजनीतिक अधिकार और प्रभाव नहीं दिया गया। इससे समाज में गलत संदेश जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक ठाकुर विधायकों द्वारा मानसून सत्र में की गई ‘कुटुम्ब’ बैठक की सीधी कड़ी है। उस बैठक में भी संगठन और सरकार में प्रतिनिधित्व को लेकर नाराजगी खुलकर सामने आई थी।

खास बात यह रही कि इस सहभोज में अन्य दलों के ब्राह्मण विधायक और एमएलसी भी शामिल हुए, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि यह गोलबंदी केवल भाजपा तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक सवर्ण राजनीतिक विमर्श की ओर बढ़ रही है।

बैठक में यह भी तय हुआ कि जनवरी में एक और बड़ी बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें समाज के राजनीतिक और सामाजिक हितों को लेकर आगे की रणनीति तय की जाएगी। माना जा रहा है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यह गतिविधियां और तेज होंगी।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि समय रहते संगठनात्मक संतुलन नहीं साधा गया, तो यह असंतोष आने वाले चुनावों में असर डाल सकता है।

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