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“लालू परिवार में विरासत की जंग खुलकर सामने आ गई है। रोहिणी आचार्य के सोशल मीडिया तंज ने राजद के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।”

हाइलाइट्स

  • सीबीआई कोर्ट ने भूमि के बदले नौकरी केस में लालू परिवार पर आरोप तय किए
  • रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर ‘अपनों’ पर साधा निशाना
  • राजद के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर सवाल
  • तेजस्वी यादव खेमे में अंदरूनी संघर्ष की चर्चा
  • विरासत और नियंत्रण को लेकर सियासी टकराव तेज


पटना।  लालू कुनबे में विरासत की जंग
अब खुलकर सामने आ चुकी है। जब अदालत का फैसला किसी राजनीतिक परिवार पर पड़ता है, तो उसकी गूंज सिर्फ़ कानून तक सीमित नहीं रहती—वह रिश्तों, भरोसे और सत्ता के संतुलन को भी हिला देती है। राष्ट्रीय जनता दल के साथ इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है।

दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआई अदालत ने भूमि के बदले नौकरी घोटाले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, मीसा भारती समेत कई आरोपितों के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं। यह फैसला कानूनी तौर पर जितना गंभीर है, उतना ही सियासी मायने भी रखता है।

अदालत के फैसले से भड़की अंदरूनी आग

इस फैसले के बाद राजद के भीतर जो बेचैनी थी, वह अब खुलकर सामने आने लगी है। बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद से ही यादव परिवार में असंतोष की चर्चाएं थीं, लेकिन अब लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने इस टकराव को सार्वजनिक कर दिया है।

रोहिणी ने बिना किसी का नाम लिए ऐसे ‘अपनों’ पर निशाना साधा, जो कथित तौर पर पार्टी और परिवार की “बड़ी विरासत” को कमजोर कर रहे हैं।

शब्दों में छुपा दर्द और तंज

रोहिणी आचार्य ने X पर लिखा—
“बड़ी शिद्दत से बनायी और खड़ी की गयी ‘बड़ी विरासत’ को तहस-नहस करने के लिए परायों की ज़रूरत नहीं होती, अपने और चंद षड्यंत्रकारी ‘नए बने अपने’ ही काफ़ी होते हैं।”

यह बयान सिर्फ़ राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि पारिवारिक पीड़ा और आक्रोश का इज़हार माना जा रहा है। उनके शब्दों में यह सवाल साफ झलकता है कि जब पहचान और अस्तित्व देने वाली विरासत को मिटाने की कोशिश अपने ही करें, तो भरोसा कैसे बचे।

किस पर इशारा?

राजनीतिक गलियारों में इस तंज को सीधे तौर पर तेजस्वी यादव के करीबी रणनीतिकार संजय यादव और सोशल मीडिया संचालन से जुड़े रमीज नेमत से जोड़ा जा रहा है। संजय यादव को तेजस्वी की राजनीति का ‘मास्टरमाइंड’ माना जाता है, जबकि रमीज नेमत पहले भी विवादों में रहे हैं।

इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या अब पार्टी की दिशा परिवार के बाहर से तय हो रही है

पहले भी हो चुका है भीतरघात का आरोप

यह पहली बार नहीं है जब लालू परिवार में ‘भीतरघात’ की बात सामने आई हो। इससे पहले तेज प्रताप यादव भी ‘जयचंद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर अपनों पर सवाल उठा चुके हैं। फर्क बस इतना है कि इस बार मामला सीधे विरासत और नेतृत्व से जुड़ गया है।

लालू प्रसाद यादव की राजनीति हमेशा परिवार, सामाजिक न्याय और यादव-मुस्लिम समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन अदालत के फैसले और परिवार के भीतर उभरते मतभेद यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाला समय सिर्फ़ कानूनी लड़ाई का नहीं, बल्कि राजद के भविष्य और नेतृत्व के पुनर्परिभाषण का भी हो सकता है।

अब राउज एवेन्यू की अदालत में चल रही सुनवाई सिर्फ़ तारीखों की कहानी नहीं रही। यह लड़ाई अब सियासी विरासत, भरोसे और नियंत्रण की बन चुकी है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या लालू कुनबा इस अंदरूनी टकराव को संभाल पाएगा, या फिर पार्टी के भीतर ही एक नई सियासी दरार और गहरी हो जाएगी?

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