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चुनाव नजदीक आते ही अखिलेश यादव और ममता बनर्जी की बदली सियासत। मंदिर निर्माण, सनातन राजनीति, UP–Bengal चुनावी रणनीति पर विशेष विश्लेषण।

हाइलाइट्स

  • चुनाव नजदीक आते ही ममता बनर्जी ने मंदिर निर्माण की श्रृंखला शुरू की
  • सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी केदारेश्वर महादेव की शरण में पहुंचे
  • पश्चिम बंगाल में घुसपैठ और बाबरी मस्जिद बनेगा बड़ा चुनावी मुद्दा
  • यूपी में SIR का मुद्दा ठंडा, सियासी लड़ाई अब PDA बनाम हिंदुत्व

अभयानंद शुक्ल
कार्यकारी संपादक

लखनऊ। इसे चुनावी मजबूरी ही कहा जाएगा कि जो नेता कभी ‘जय श्रीराम’ के नारे से भड़क उठते थे, आज वही मंदिरों के शिलान्यास में जुटे हैं और जो नेता मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के लिए पहचाने जाते रहे, वे भोलेनाथ की शरण में दिखाई देने लगे हैं। वर्ष 2025 के समाप्त होते-होते यह नजारा एक बार फिर भारतीय राजनीति में साफ दिखने लगा है।

यहां चर्चा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे दोनों नेताओं को देवी–देवताओं की याद सताने लगी है। फर्क सिर्फ इतना है कि ममता बनर्जी जहां सनातन की तीनों धाराओं—शैव, वैष्णव और शाक्त—को साधने की कोशिश में हैं, वहीं अखिलेश यादव ने मध्यमार्गी आस्था के प्रतीक भोलेनाथ को ही अपना सहारा बनाया है।

अखिलेश यादव: PDA से महादेव तक

समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने राजनीति में आते ही PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की सियासत को अपना आधार बनाया। इस रणनीति के चलते उन पर सवर्ण विरोधी और मुस्लिमपरस्त होने के आरोप लगते रहे। यही नहीं, पार्टी के कई गठबंधन सहयोगी भी उनके लिए राजनीतिक बोझ बनते नजर आए।

अब जब 2026 में पंचायत चुनाव और 2027 में विधानसभा चुनाव सामने हैं, तो अखिलेश यादव की सियासी दिशा में बदलाव साफ दिख रहा है। बीते सप्ताह उन्होंने इटावा जिले के चंबल क्षेत्र में परिवार द्वारा बनवाए जा रहे केदारेश्वर महादेव मंदिर में पूजन-अर्चन किया।

गौर करने वाली बात यह है कि यही अखिलेश यादव अब तक अयोध्या के राम मंदिर नहीं गए हैं, जिसको लेकर उनसे लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में पंचायत चुनाव से ठीक पहले उनका महादेव की शरण में जाना राजनीतिक संकेतों से खाली नहीं है।
यूपी विधानसभा चुनावों में अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाने और मुस्लिम बहुल सीटें गंवाने के बाद शायद अब उन्हें यह एहसास हो गया है कि केवल एक वर्ग की राजनीति से सत्ता का रास्ता आसान नहीं होने वाला।

ममता बनर्जी: जय श्रीराम से जय महाकाल तक

अब बात पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की। उनकी राजनीतिक छवि लंबे समय से मुस्लिमपरस्त नेता की रही है। बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर नरमी और हिंदू भावनाओं की उपेक्षा के आरोप उन पर लगते रहे हैं।

लेकिन जब से निलंबित टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद निर्माण की मुहिम छेड़ी है, ममता की मुश्किलें बढ़ गई हैं। हुमायूं कबीर के तीखे बयान अब भाजपा से ज्यादा ममता सरकार को निशाने पर ले रहे हैं। ऊपर से भाजपा की बढ़ती सियासी पकड़ ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है।

यही कारण है कि कभी ‘जय श्रीराम’ के नारे से चिढ़ने वाली ममता बनर्जी अब खुले तौर पर देवी–देवताओं की शरण में नजर आ रही हैं।

  • महाकाल मंदिर के निर्माण की घोषणा
  • जनवरी के दूसरे हफ्ते में सिलीगुड़ी में शिलान्यास
  • दीघा में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण
  • कोलकाता में दुर्गा आंगन की घोषणा

इन सभी कार्यक्रमों में वे ‘जय दुर्गा मां’ के नारे लगाकर खुद को बड़ा सनातनी साबित करने की कोशिश कर रही हैं। खबरें यह भी हैं कि इन परियोजनाओं में सरकारी धन का इस्तेमाल किया जाएगा, जिसको लेकर हुमायूं कबीर उन्हें घेर रहे हैं।

राजनीति का नया मंत्र: सनातन

कुल मिलाकर, ममता बनर्जी शैव, वैष्णव और शाक्त—तीनों धाराओं को साधकर 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले हिंदुत्व की पिच पर बल्लेबाजी करना चाहती हैं। वहीं अखिलेश यादव भी PDA की राजनीति से आगे बढ़कर सवर्ण वोटरों को साधने के प्रयास में दिख रहे हैं।

साफ है कि दोनों नेताओं को अब यह समझ में आने लगा है कि सनातन की अनदेखी कर सत्ता की राजनीति संभव नहीं।
चुनाव करीब हैं और आस्था एक बार फिर राजनीति का सबसे मजबूत हथियार बनती जा रही है।

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