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SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी सामने आई है। ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा—मतदाता सूची संशोधन में कोई बाधा बर्दाश्त नहीं।

हाइलाइट्स :

  • SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी, बाधा बर्दाश्त नहीं
  • 1.36 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने की आशंका जताई गई
  • 8,300 माइक्रो-ऑब्जर्वर की तैनाती पर सवाल
  • बंगाल सरकार से अधिकारियों के नाम भेजने में देरी पर टिप्पणी
  • SIR की समय-सीमा एक सप्ताह बढ़ाई गई

नई दिल्ली। SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को साफ शब्दों में कहा कि विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) में किसी भी प्रकार की बाधा या हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

कोर्ट ने क्या कहा?

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही SIR प्रक्रिया को बिना किसी अवरोध के पूरा किया जाना चाहिए। अदालत ने सभी राज्य सरकारों को स्पष्ट संदेश दिया कि वे इस संवैधानिक प्रक्रिया में सहयोग करें, न कि बाधा उत्पन्न करें।

ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें उन्होंने SIR के दौरान 1.36 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की आशंका जताई है। ममता का दावा है कि गलत स्पेलिंग, सरनेम में त्रुटि और शादी के बाद पते बदलने जैसी तकनीकी वजहों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जा सकते हैं।

8,300 माइक्रो-ऑब्जर्वर पर उठे सवाल

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त 8,300 माइक्रो-ऑब्जर्वर की तैनाती पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि ये केंद्र सरकार से जुड़े अधिकारी हैं, जिनकी नियुक्ति राज्य सरकार की सहमति के बिना की गई है।

बंगाल सरकार से सुप्रीम कोर्ट के सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से पूछा कि माइक्रो-ऑब्जर्वर से जुड़े अधिकारियों के नाम भेजने में देरी क्यों की गई। अदालत ने इसे गंभीर विषय बताते हुए जवाब मांगा।

SIR की समय-सीमा बढ़ी

कोर्ट ने व्यावहारिक पहलुओं को देखते हुए SIR प्रक्रिया की समय-सीमा एक सप्ताह तक बढ़ा दी, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इस दौरान कोई राजनीतिक या प्रशासनिक बाधा स्वीकार नहीं की जाएगी।

पहली सेवारत मुख्यमंत्री के रूप में पेश हुईं ममता

गौरतलब है कि ममता बनर्जी चार फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में बहस करने वाली देश की पहली सेवारत मुख्यमंत्री बनी थीं। इस पर भी एक याचिका दाखिल कर सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्यमंत्री व्यक्तिगत हैसियत में इस तरह पेश हो सकती हैं।

हस्तक्षेप याचिका भी दाखिल

अखिल भारत हिंदू महासभा के पूर्व उपाध्यक्ष सतीश कुमार अग्रवाल ने इस मामले में हस्तक्षेप याचिका दाखिल करते हुए कहा है कि SIR राज्य शासन और चुनाव आयोग से जुड़ा संवैधानिक विषय है, न कि मुख्यमंत्री का व्यक्तिगत मामला।

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