“लखनऊ में शुरू हुआ जनजातीय संस्कृति का सबसे बड़ा उत्सव। बिरसा मुंडा की पगड़ी में थारू नृत्य, मुखौटा प्रदर्शनी, पारंपरिक व्यंजन और सरकारी योजनाओं का पूरा प्रदर्शन। एंट्री फ्री।”
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में बुधवार सुबह इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान एक अलग ही रंग में रंग चुका था। जनजातीय परंपराओं के गीत, ढोल-मृदंग की थाप, रंग-बिरंगी पोशाकों में थिरकते कलाकार और 22 राज्यों की संस्कृति—सब मिलकर एक राष्ट्रीय जनजातीय संगम का दृश्य बना रहे थे। इसी माहौल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मृदंग बजाकर जनजाति भागीदारी उत्सव का शुभारंभ किया।

यह उत्सव 15 दिवसीय जनजातीय पखवाड़े का हिस्सा है और उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे एक विशेष सांस्कृतिक और सामाजिक अभियान के रूप में आयोजित किया है। इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के साथ-साथ उत्तर-पूर्व, मध्य भारत, गुजरात से लेकर दक्षिण भारत तक की जनजातियों की अनोखी परंपराओं का प्रदर्शन किया जा रहा है।
सबसे बड़ी बात—एंट्री फ्री है, जिससे आम जनता की भारी भीड़ उमड़ रही है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा —”जनजातियों की विरासत भारत की आत्मा है”
“जनजाति समुदाय का इतिहास भारत की सांस्कृतिक आत्मा है। उनकी परंपरा, उनकी जीवनशैली और उनकी वीरगाथाएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में है।”
उन्होंने बताया कि जनजाति पखवाड़े का उद्देश्य सिर्फ सांस्कृतिक उत्सव नहीं है, बल्कि जनजातीय समाज को मुख्यधारा से जोड़ना, उनके अधिकारों व योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करना भी है।

थारू समुदाय की धूम—बिरसा मुंडा की पगड़ी और लट्ठ नृत्य
- उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण रहा सोनभद्र और नेपाल सीमा से आए थारू कलाकारों का अनूठा प्रदर्शन।
- कलाकारों ने भगवान बिरसा मुंडा की पगड़ी पहनकर मृदंग बजाया
- महिलाएं पारंपरिक पोशाक में झूमती नजर आईं
- और एक युवा कलाकार का ‘लों (लट्ठ) पर नृत्य’ तो पूरे कार्यक्रम की जान बन गया

यह नृत्य उनकी सदियों पुरानी परंपरा से जुड़ा है, जो संतुलन, शक्ति और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है।
100+ स्टॉल—व्यंजन से लेकर हस्तशिल्प तक
IGP परिसर में लगे 100 से अधिक स्टॉल लोगों को जनजातीय दुनिया के करीब ले जा रहे हैं।
स्टॉलों में प्रदर्शित हैं—
✔ बांस से बने पारंपरिक उत्पाद
✔ मुंडा, संथाल, भील पेंटिंग
✔ नागालैंड के ज्वेलरी और हथियार
✔ छत्तीसगढ़ के लौह शिल्प
✔ जनजातीय व्यंजन—मड़ुआ रोटी, झारखंड का धेंकी चावल, नागा स्मोक फिश
✔ अरुणाचल प्रदेश की हस्त-करघा शॉलें
✔ त्रिपुरा की बांस की टोकरियाँ
हर राज्य के कलाकार अपने स्टॉल पर स्थानीय कहानियाँ, विरासत और परंपरा समझा रहे हैं। यह अनुभव किसी जीवंत संग्रहालय जैसा है।

मुखौटा प्रदर्शनी—जनजातीय चेतना का अनोखा दस्तावेज
हिमालय विश्व संग्रहालय से आए विशेषज्ञ सिकिम सा ने बताया कि जनजातीय मुखौटे केवल सजावट नहीं बल्कि— इतिहास की निशानी, धार्मिक आस्था का माध्यम, और प्रकृति व मानव के संबंध का रूपक हैं।
इस प्रदर्शनी में सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल और असम के दर्जनों पारंपरिक मुखौटे लगाए गए हैं, जो हर आगंतुक का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।

22 राज्यों की भागीदारी—राष्ट्रीय स्तर का आयोजन
यह उत्सव वास्तव में भारत की विविधता को एक मंच पर लाने वाला उत्सव है। इसमें शामिल हैं—
- उत्तर प्रदेश
- बिहार
- झारखंड
- गुजरात
- असम
- त्रिपुरा
- अरुणाचल प्रदेश (पार्टनर स्टेट)
- मध्यप्रदेश
- महाराष्ट्र
- ओडिशा
- नागालैंड
- मिजोरम
- राजस्थान
- हिमाचल
- उत्तराखंड
- कर्नाटक
- छत्तीसगढ़
- तमिलनाडु
इन राज्यों के 250 से अधिक कलाकार प्रदर्शन कर रहे हैं।
UP सरकार के जनजातीय विकास कार्य—योगी ने गिनाए उपलब्धियाँ
मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि यूपी सरकार ने मिशन मोड में जनजातीय योजनाओं पर काम किया है। उन्होंने बताया—
बिजनौर के 815 जनजाति परिवारों को 145 प्रधानमंत्री आवास, शुद्ध पेयजल सुविधा, मोबाइल मेडिकल यूनिट ,आंगनबाड़ी केंद्र, मोबाइल टावर, 5 मल्टीपरपज केंद्र, 5 वन धन केंद्र, स्वीकृत किए जा चुके हैं।
सरकार का लक्ष्य है कि UP की हर जनजाति—थारू, रक्सा, सहरिया, कोल, गुंजनिया—सभी को योजनाओं का पूरा लाभ मिले।

150 वर्ष का ऐतिहासिक वर्ष
योगी ने बताया कि यह वर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि—सरदार वल्लभ भाई पटेल की 150वीं जयंती,, भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती, राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष एक साथ पूरे हो रहे हैं।
इसी को सम्मान देते हुए पूरे देश में जनजातीय पखवाड़ा (1–15 नवंबर) मनाया जा रहा है।

उत्सव में उमड़ा जन सैलाब—लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान मजबूत
पहले दिन से ही उत्सव में—हजारों की भीड़, फोटो पॉइंट्स, पारंपरिक नृत्य, जीवंत संगीत और बच्चों के लिए खास एक्टिविटी ज़ोन ने माहौल को बेहद जीवंत बना दिया है। लखनऊ के लोग इसे केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव बता रहे हैं।
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